BNS Section 36 in Hindi: धारा 36 क्या है? निजी प्रतिरक्षा का अधिकार आसान भाषा में

 

BNS धारा 36 क्या है? निजी प्रतिरक्षा के अधिकार को आसान भाषा में समझें

भारतीय न्याय संहिता, 2023 (Bharatiya Nyaya Sanhita, 2023) की धारा 36 निजी प्रतिरक्षा (Right of Private Defence) से संबंधित एक महत्वपूर्ण प्रावधान है। यह उस स्थिति को स्पष्ट करती है जब कोई व्यक्ति ऐसा कार्य करता है जो सामान्य परिस्थितियों में अपराध माना जाता, लेकिन उस व्यक्ति की कम उम्र, समझ की अपरिपक्वता, मानसिक अस्वस्थता, नशे या किसी भ्रम के कारण स्वयं वह कार्य अपराध नहीं माना जाता।

ऐसी स्थिति में भी उस व्यक्ति के विरुद्ध दूसरे व्यक्ति का निजी प्रतिरक्षा का अधिकार समाप्त नहीं होता। कानून उसे उसी प्रकार अपनी रक्षा करने का अधिकार देता है, जैसे वह कृत्य सामान्य रूप से अपराध होता।

BNS धारा 36 का मुख्य उद्देश्य

BNS Section 36 in Hindi – Advocate D.S. Rathore


धारा 36 का मूल उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि किसी व्यक्ति को केवल इसलिए अपनी सुरक्षा से वंचित न होना पड़े क्योंकि हमला करने वाला व्यक्ति आपराधिक रूप से उत्तरदायी नहीं है।

उदाहरण के लिए, यदि मानसिक रूप से अस्वस्थ व्यक्ति किसी दूसरे व्यक्ति पर जानलेवा हमला करता है, तो मानसिक अस्वस्थता के कारण हमलावर पर अपराध की आपराधिक जिम्मेदारी न भी बने, फिर भी जिस व्यक्ति पर हमला किया गया है, उसे अपनी रक्षा करने का अधिकार रहेगा।

अर्थात् हमलावर की आपराधिक जिम्मेदारी और पीड़ित के निजी प्रतिरक्षा के अधिकार को कानून अलग-अलग देखता है।

BNS धारा 36 का सरल अर्थ

धारा 36 को सरल भाषा में इस प्रकार समझ सकते हैं—

यदि कोई कार्य सामान्य स्थिति में अपराध होता, लेकिन उसे करने वाले व्यक्ति की:

  • कम उम्र,

  • समझ की अपरिपक्वता,

  • मानसिक अस्वस्थता,

  • नशे की स्थिति, या

  • किसी तथ्य के संबंध में भ्रम

के कारण वह कार्य अपराध नहीं माना जाता, तो भी उस कार्य से प्रभावित व्यक्ति को निजी प्रतिरक्षा का वही अधिकार प्राप्त रहेगा, जो उसे तब प्राप्त होता यदि वह कार्य अपराध होता।

BNS धारा 36 किन परिस्थितियों को कवर करती है?

1. कम उम्र के व्यक्ति का कृत्य

यदि कोई बहुत कम उम्र का व्यक्ति ऐसा कार्य करता है जिससे किसी दूसरे व्यक्ति को खतरा उत्पन्न होता है और उसकी उम्र के कारण उस पर आपराधिक जिम्मेदारी नहीं बनती, तब भी खतरे में पड़े व्यक्ति का निजी प्रतिरक्षा का अधिकार समाप्त नहीं होता।

2. समझ की अपरिपक्वता

यदि किसी व्यक्ति में पर्याप्त समझ या परिपक्वता का अभाव है और उसके द्वारा ऐसा कार्य किया जाता है जिससे दूसरे व्यक्ति को खतरा उत्पन्न होता है, तो प्रभावित व्यक्ति अपनी रक्षा कर सकता है।

3. मानसिक अस्वस्थता

यदि मानसिक रूप से अस्वस्थ व्यक्ति किसी दूसरे व्यक्ति पर ऐसा हमला करता है जो सामान्य व्यक्ति द्वारा किया जाता तो अपराध होता, तब भी हमले का सामना करने वाले व्यक्ति को निजी प्रतिरक्षा का अधिकार प्राप्त रहेगा।

4. नशे की स्थिति

धारा 36 नशे की स्थिति में किए गए ऐसे कृत्य को भी ध्यान में रखती है, जहाँ उस व्यक्ति की स्थिति के कारण उसके कृत्य की आपराधिक प्रकृति प्रभावित हो सकती है।

5. तथ्य के संबंध में भ्रम

यदि कोई व्यक्ति किसी भ्रम (misconception) के कारण दूसरे व्यक्ति पर हमला करता है और कानून के अनुसार उसका वह कार्य अपराध नहीं बनता, तब भी जिस व्यक्ति पर हमला किया गया है, वह अपनी रक्षा कर सकता है।

धारा 36 का उदाहरण

मान लीजिए Z मानसिक रूप से अस्वस्थ है और A को मारने का प्रयास करता है।

मानसिक अस्वस्थता के कारण Z स्वयं उस कृत्य के लिए अपराधी न माना जाए, फिर भी A को अपनी रक्षा करने का वही अधिकार होगा जो A को तब होता यदि Z मानसिक रूप से स्वस्थ होता।

BNS धारा 36 की Illustration (a) इसी सिद्धांत को स्पष्ट करती है।

भ्रम का उदाहरण

मान लीजिए A रात के समय अपने ही अधिकार वाले घर में प्रवेश करता है। Z सद्भावना में A को चोर समझकर उस पर हमला कर देता है।

Z का यह कृत्य उसके वास्तविक भ्रम के कारण अपराध न माना जाए, फिर भी A को Z के विरुद्ध निजी प्रतिरक्षा का वही अधिकार प्राप्त रहेगा, जो A को तब प्राप्त होता यदि Z किसी भ्रम में नहीं होता। यह धारा 36 की Illustration (b) में दिया गया सिद्धांत है।

क्या धारा 36 में कोई सजा निर्धारित है?

नहीं।

BNS की धारा 36 स्वयं कोई स्वतंत्र अपराध निर्धारित नहीं करती और न ही इसमें कोई अलग सजा निर्धारित की गई है। यह निजी प्रतिरक्षा के अधिकार से संबंधित एक General Exception का प्रावधान है।

इसलिए केवल धारा 36 के आधार पर किसी व्यक्ति को दंडित करने का प्रश्न नहीं उठता। यदि किसी व्यक्ति द्वारा निजी प्रतिरक्षा की सीमा से बाहर जाकर कोई कृत्य किया जाता है, तो उस कृत्य की परिस्थितियों के अनुसार BNS की अन्य धाराएँ लागू हो सकती हैं।

BNS धारा 36 और IPC धारा 98 में संबंध

भारतीय न्याय संहिता लागू होने से पहले इसी विषय का प्रावधान भारतीय दंड संहिता, 1860 की धारा 98 में था।

BNS की धारा 36 मूलतः IPC की धारा 98 में मौजूद इसी कानूनी सिद्धांत को आगे बढ़ाती है।

पुराना कानूननया कानून
IPC धारा 98BNS धारा 36
मानसिक अस्वस्थ व्यक्ति आदि के कृत्य के विरुद्ध निजी प्रतिरक्षामानसिक अस्वस्थ व्यक्ति आदि के कृत्य के विरुद्ध निजी प्रतिरक्षा

इसलिए पुराने IPC से BNS की पढ़ाई करने वाले विद्यार्थियों के लिए IPC 98 = BNS 36 याद रखना उपयोगी है।

BNS धारा 36 और निजी प्रतिरक्षा की सीमा

यह समझना महत्वपूर्ण है कि धारा 36 किसी व्यक्ति को असीमित बल प्रयोग की अनुमति नहीं देती।

यह प्रावधान केवल यह बताता है कि हमला करने वाले व्यक्ति की कम उम्र, अपरिपक्वता, मानसिक अस्वस्थता, नशे या भ्रम जैसी स्थिति के कारण उसके कृत्य की आपराधिक जिम्मेदारी प्रभावित होने पर भी पीड़ित का निजी प्रतिरक्षा का अधिकार समाप्त नहीं होगा।

निजी प्रतिरक्षा के अन्य नियमों और उसकी सीमाओं को BNS की निजी प्रतिरक्षा से संबंधित अन्य धाराओं के साथ पढ़ना आवश्यक है।

परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण बिंदु

BNS धारा 36 के महत्वपूर्ण Points:

  1. यह Right of Private Defence से संबंधित है।

  2. यह General Exceptions के अंतर्गत आती है।

  3. इसका संबंध ऐसे व्यक्ति के कृत्य से है जो अपनी स्थिति के कारण आपराधिक रूप से उत्तरदायी न हो सकता है।

  4. इसमें कम उम्र, समझ की अपरिपक्वता, मानसिक अस्वस्थता, नशा और misconception जैसी परिस्थितियाँ शामिल हैं।

  5. पीड़ित का निजी प्रतिरक्षा का अधिकार केवल इसलिए समाप्त नहीं होता कि हमलावर पर अपराध की जिम्मेदारी नहीं बनती।

  6. धारा 36 स्वयं कोई स्वतंत्र दंड निर्धारित नहीं करती।

  7. IPC धारा 98 का corresponding provision BNS धारा 36 है।

निष्कर्ष

BNS धारा 36 का मूल सिद्धांत सरल है—किसी व्यक्ति की आपराधिक जिम्मेदारी न बनने से दूसरे व्यक्ति का अपनी रक्षा करने का अधिकार समाप्त नहीं होता।

यदि कोई व्यक्ति कम उम्र, अपरिपक्व समझ, मानसिक अस्वस्थता, नशे या किसी भ्रम के कारण ऐसा कृत्य करता है जिससे दूसरे व्यक्ति को खतरा उत्पन्न होता है, तो खतरे में पड़ा व्यक्ति कानून के अनुसार अपनी निजी प्रतिरक्षा का प्रयोग कर सकता है।

इस प्रकार BNS धारा 36 अपराधी की criminal liability और पीड़ित के right of private defence के बीच अंतर को स्पष्ट करती है।

एक लाइन में याद रखें:
“हमलावर अपराध के लिए उत्तरदायी न हो, फिर भी उसके कृत्य के विरुद्ध निजी प्रतिरक्षा का अधिकार बना रह सकता है।”

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